Monday, April 27, 2009
योगवाशिष्ठ
योगवाशिष्ठ को महर्षि द्वारा रचित माना जाता है। योगवाशिष्ठ पूर्णतः दार्शनिक ग्रन्थ है। इसमें रामकथा के माध्यम से मोक्षोपाय का कथन किया गया है इसीलिये इसे मोक्षोपाय शास्त्र भी कहा जाता है। रामकथा इसकी मुख्य कथा है जिसके अन्तर्गत अवान्तर आख्यानों अवं उपाख्यानों से सच्चिदानन्द ब्रह्म की प्राप्ति का उपाय बताया गया है। योगवाशिष्ठ में महर्षि वशिष्ठ जीए स्वयं कहते हैं कि द्वारा ज्ञात वस्तु का ज्ञान दूसरे को अनुभूत करवाने के लिये दृष्टान्त से बढ़कर कोई दूसरा साधन नही है। इसीलिये इस ग्रन्थ में हमें पग-पग पर दृष्टान्त मिलता है। योगवाशिष्ठ की रचना किसी साधारण मानस द्वारा सम्भव ही नही हो सकती इसकी रचना कोई त्रिकालज्ञ उदात्त ऋषि ही कर सकता है जिसका मानस मुक्त मानस हो। क्योंकि बद्ध मानस मुक्त मानस की बात ही नही कर सकता। योगवाशिष्ठ का रचनाकार मात्र एक ऋषि ही नहीं वरन् एक कवि भी है। कवि अथवा ऋषि का कार्य मात्र उपदेश देना ही नहीं होता अपितु उपदिष्ट वस्तु का अनुभव करवाना भी होता है। योगवाशिष्ठ के महर्षि ने दार्शनिकता को काव्यात्मकता का सरस सरल सहज कलेवर पहनाकर उसे जन-जन के लिये, प्रत्येक जिज्ञासु के लिये बोधगम्य बना दिया। योगवाशिष्ठ का प्रत्येक पात्र जनसमुदाय में शताब्दियों से रचा-बसा पात्र है जिसके साथ भारतीय जनता की भारतीय संस्कृति की भावनायें जुड़ी हुई हैं। लोक और शास्त्र में विरोध नही परिलक्षित होता है दोंनो साथ-साथ समानान्तर चलते हैं। योगवाशिष्ठ में लोक और शास्त्र का सुन्दर समन्वय है। इसके आख्यान लौकिक और लोकोत्तर दोनो विशेषताओं से युक्त हैं। विदुषी चूडाला का आख्यान जिसमें चूडाला अपने पति राजा शिखिध्वज को कुम्भ का रूप धारणकर ज्ञान प्रदान करती है, उत्कृष्ट कोटि का दार्शनिक व सामाजिक आख्यान है। इस आख्यान से यह भी परिलक्षित होता है कि उस समय स्त्रियाँ भी महान् विदुषी हुआ करती थीं। योगवाशिष्ठ में ज्ञान,कर्म और भक्ति का सुन्दर समन्वय है। यहाँ जिस कर्म का निरूपण किया गया है वह साधारण लौकिक बन्धनकारी कर्म न होकर निष्काम कर्म है। हालांकि श्रीमद्भगवद्गीता में भी निष्काम कर्म का उपदेश है परन्तु उससे यहाँ अन्तर इतना है कि गीता में प्रदत्त उपदेश शुष्क दार्शनिक हैं जबकि योगवाशिष्ठ के उपदेश काव्य की उर्वर भूमि पर गुणों और अलंकारों द्वारा सिंचित होकर सरस एवं सहज हैं।
Saturday, October 18, 2008
स्त्रियों के लिये असुरक्षित दिल्ली
आज महिलाएँ घर के बाहर् और भीतर हर जगह असुरक्षित हैं । अभी हाल ही में दिल्ली की एक पत्रकार की हत्या इसका जीता-जागता उदाहरण है। ऐसे में हमारे आश्चर्य की सीमा तब पार हो जाती है जब दिल्ली की मुख्यमन्त्री शीला दीक्षित इस घटना पर प्रतिक्रिया करते हुए कहती हैं कि सौम्या को रात में नही निकलना चाहिये था यह दुःसाहसिक कार्य है । अब जब भारत की राजधानी दिल्ली में स्त्रियाँ इतनी असुरक्षित हैं तब देश के अन्य भागों की बात कौन करे? मुख्यमन्त्री शीला दीक्षित का यह बयान निश्चय ही दुर्भाग्यपूर्ण है क्योंकि यदि मुख्यमन्त्री ही ऐसा बयान देने लगेगी तब तो अपराधियों का मनोबल और ऊँचा होगा और स्त्रियों को छेड़ना , बलात्कार करना और हत्या तक करना उनके लिये चुटकियोँ की बात हो जायेगी। कम से कम हमारे राजनेताओं को ऐसे शुतुरमुर्गी समाधानयुक्त बयानों से बाज आना चाहिए। ऐसे बयानों से समाज में एक गलत संदेश जाता है । सरकार किस लिये है जब वह अपने नागरिकों को सुरक्षा तक न मुहैया करा पाये और कोई घटना घटित होने पर उसे दुःसाहस बताये ?
Saturday, September 20, 2008
स्त्री-पुरुष अनुपात में असंतुलन
में आजकल कन्या भ्रूण हत्याओं के कारण लगातार लड़कियों की संख्या में कमी हो रही है । यह चिन्ताजनक है । क्योंकि लड़्कियों के विना समाज चल सकता है क्या? स्त्री और पुरुष किसी समाज के आधारभूत और अनिवार्य घटक हैं पर हमारे यहाँ आजकल इस सर्वमान्य तथ्य को नज़र अन्दाज़ करके लड़कियों को अनावश्यक तत्त्व समझा जाने लगा है इसी का परिणाम है कि आज हमारी सरकार यहाँ काम कर रहे एनजीओ सभी इस विषय में चिन्तित हैं । चिन्ता इस सन्दर्भ को लेकर भी है कि यदि स्त्री-पुरुष अनुपात में बहुत बड़ा अन्तर हुआ तो समाज में स्त्रियाँ सर्वथा असुरक्षित हो जायेंगी तथा पर्दा-प्रथा जैसी कुरीतियाँ फिर से जन्म लेने लगेगीं ।कोई भी कुरीति विषमता में ही जन्म लेती है । स्त्रियों की कम संख्या एक प्रकार की विषमता ही है । समाज में इस प्रवृत्ति के यदि तह में हम जायें तो देखेंगे कि इसका मूल कारण दहेज-प्रथा है । माता-पिता कभी यह नहीं चाहते कि उनकी पुत्री को उसके अनुरूप घर-वर न मिले और इसके लिये वे भरसक प्रयत्न करते हैं । पर उनके इस प्रयत्न में दहेज एक बहुत बड़ा अवरोधक बनकर खड़ा हो जाता है और अन्ततः अनेक माता-पिता को अपनी पुत्री को उससे कहीं अयोग्य व्यक्ति को ब्याहना पड़ता है । जिससे उनका हृदय रो पड़ता है उस समय । उनके पास अपनी विवशता पर आँसू बहाने के सिवा कुछ नहीं रहता। उस मनोभूमि में मात्र वह यही सोंच सकते हैं कि काश! मेरे बेटी ही न होती तो आज मुझे ये दुर्दिन न देखना पड़ता । कविवर सूर्यकान्त त्रिपाठी "निराला" की कविता "सरोजस्मृति " इसका एक सशक्त उदाहरण है । जिसमें वे अपनी व्यथा-कथा स्वयं कह उठते हैं । आज स्वतन्त्रता के छः दशक बाद भी स्थिति में कुछ सुधार नही हुआ है बल्कि स्थिति बद् से बदतर हो गयी है । समाज में आज दहेज के लोभियों की गिनती नही की जा सकती । स्थिति यह है । कि कुछ लोग जो बाहर से स्वयं को दहेज विरोधी दिखाते हैं वही लोग जब अपने पुत्र का विवाह करते हैं तब उसके जन्म से लेकर विवाह के दस वर्ष बाद तक का उसके ऊपर लगने वाला पूरा खर्चा वसूल लेते हैं । बात वही होती है बस अपनी पटुता से वे दूसरी तरह कहकर लड़की के पिता को निचोड़ने का भरसक प्रयत्न करते हैं । बात यहीं नहीं समाप्त हो जाती विवाह के बाद बच्चे भी हो जाने तक उनकी दहेज की माँग बन्द नही होती । उसके लिये वे पुत्रवधू को अमानवीय प्रताड़नाएं भी देने से नहीं चूकते जिसके चलते आज असंख्य बेटियाँ या तो ससुराल वालों के द्वार जबरदस्ती मौत की गोद में सुला दी जाती हैं अथवा इन सब से ऊबकर स्वयं मौत का रास्ता चुन लेती हैं और माता-पिता को जीवन भर अपनी विवशता पर आँसू बहाने को छोड़ जाती हैं। आश्चर्य की बात यह है कि इस कार्य में आगे रहने वालों में महिलाओं की संख्या पुरुषों से कहीं अधिक है । बहुओं को प्रताड़ित करने के जितने मामले आयेदिन समाचार-पत्रों में आते रहते हैं उनमें महिलाओं द्वारा प्रताड़ना का प्रतिशत अधिक रहता है । यह और भी चिन्ताजनक बात है ।इन्ही सब के चलते आज भारतीय समाज में ऐसे लोगों की संख्या अधिक हो गयी है जो बेटियाँ नहीं चाहते क्योंकि जन्म देकर उनको जीवन भर घुट-घुट कर जीता देखने से अच्छा है कि उनका जन्म ही न हो । परन्तु यह प्रवृत्ति आदर्श समाज के लिये बहुत घातक है । इससे भरतीय समाज में वे कुरीतियाँ पुनः व्याप्त हो जायेंगी जिनको मिटाने के लिये अनेक सुधार आन्दोलन चलाये गये । इस प्रवृत्ति को रोकने का एकमात्र उपाय यही है कि समाज से इस दहेज प्रथा का समूलोच्छेद किया जाय । इसी एक कार्य से समस्त कार्य सिद्ध हो जायेंगे समाज में स्त्रियों को उनका सम्मान मिलने लगेगा तथा समाज में तद्विषयक कुरीतियाँ भी घर नहीं करने पायेंगी । अतः आज व्यक्ति, समाज, सरकार व स्वयंसेवी संगठनों को इस विषय में जागरूक होंने तथा ठोस कारगर कदम उठाने की आवश्यकता है ताकि भविष्य के संकट से बचा जा सके ।
Monday, September 8, 2008
दहेज
स्वतन्त्रता के इतने वर्षों बाद भी आज हम वस्तविक रूप से सभ्य नही हो पाये हैं । फिर भी स्वयं को सभ्य कहते हुए हमें कोई शर्म नही आती ।दहेज आज भी एक दानव के समान हामरे बीच व्याप्त है। न केवल वह अस्तित्व में ही है अपितु दिन-प्रतिदिन वह पुष्ट होता जा रहा है । उसकी बेल दिन दूना रात चौगुना बढ़ रही है । सच है पर थोड़ा कड़वा है वैसे सच का स्वभाव होता है कड़वा होना आज का धनी वर्ग सबसे अधिक दहेज लोभी है । उसने दहेज का नाम परिवएतन अवश्य किया है पर माल वही है । कुल मिलाकर बात वही है नई बोतल में पुरानी शराब । ये प्रथा दिन प्रतिदिन और भयावह होती जा रही है । आज दहेज के कारण कितनी निर्मलाओं की अधिक उम्र के लड़के से शादी कर दी जा रही है इसका कोई रेकार्ड सरकार के पास न कभी रहा है न रहेगा भी । आखिर ऎसा रेकार्ड रहेगा कैसे इस पर तो समाज के तथाकथित दिग्गजों दूसरे शब्दों मे बड़े लोगों का पहरा होता है । ऎसे में क्या माज़ाल की सरकारी नासिका को इसकी सुगन्ध लग जाय । मामला जब धन के लेनी देनी का हो तब तो सरकारी नाक को पानी में भिगो-भिगोकर ज़ुकाम कराया जाता है ताकि उसे उसकी नाक के तले की गन्ध का भी पता तक न चले भविष्य में कोई मामला उठने पर वह मेडिकल सर्टिफिकेट दिखा सके की उसे ज़ुकाम था । कै बार ऎसे मेंतो मेढकियों तक को ज़ुकाम होते देखा गया है। चाहे क्यों न यह समाज के लिये अज़ूबा हो पर ऎसे अवसरों पर मेढकी को भी ज़ुकाम हो सकता है आखिर आम भी तो इमली हो सकता है मोटी रकम हथियानी है न किसी शिकार को फँसाकर अन्यथा पत्नी व बच्चों के पाँच सितारा होटलों में खाने, पार्टियों में जाने के शौक कैसे पूरे होंगे?
ये शौक तो पूरे करने ही हैं चाहे कितनी ही निर्मलाओं की मौत हो चाहे कितने ही प्रेमचन्द उनकी व्यथा -कथा लिखे पर ये शौक तो सबसे आगे है उससे सरकारी नाक को कोई सरोकार नही वह प्रेमचन्द को पड़कर द्रवित नही हो सकती वो बातें तो आउटडेटेड हैं । उसको तो जुकाम कराकर आपना काम निकालना है । तभी तो वह समाज में सफल माना जायेगा ।इस दहेज की समस्या की अनदेखी बड़े लोगों की नाक भी हमेशा करती है क्योंकि इसमे पड़कर उसकी "प्रतिष्ठा" न धूमिल हो जाय।
ये शौक तो पूरे करने ही हैं चाहे कितनी ही निर्मलाओं की मौत हो चाहे कितने ही प्रेमचन्द उनकी व्यथा -कथा लिखे पर ये शौक तो सबसे आगे है उससे सरकारी नाक को कोई सरोकार नही वह प्रेमचन्द को पड़कर द्रवित नही हो सकती वो बातें तो आउटडेटेड हैं । उसको तो जुकाम कराकर आपना काम निकालना है । तभी तो वह समाज में सफल माना जायेगा ।इस दहेज की समस्या की अनदेखी बड़े लोगों की नाक भी हमेशा करती है क्योंकि इसमे पड़कर उसकी "प्रतिष्ठा" न धूमिल हो जाय।
जब मेरे पुत्र इन आस्तीन के साँपों के लिये फिर ....................
मैं कभी
सोने की चिड़िया था
कभी नन्दनवन था
कभी मैं
देवों के लिये मनभावन था
प्रसारित होता था
मुझसे......
एकता प्रेम, विश्वबन्धुतव का
संदेश
था मैं शान्ति का प्रतीक
अति पावन था यह भारत देश
पर आज
मेरी सीमाएँ
सुलग रही हैं
कही माओवदी आग लगा रहे हैं
कही अलगाववादी लोगों को
भगा रहे हैं
कही आतंकवादी
हमको उड़ाने की
योजना बना रहे हैं
कहीं बन विस्फोट हो रहे हैं
कही सरे आम गोलियाँ चल रही हैं
कही पर कर्फ्यू लगा है
कही प्रदर्शन हो रहा है
ये सब देख कर मैं रो पड़ता हूँ
सच में........
आज मैं केसी करुण कवि की
कारुण्यपूर्ण कविता से भी
करुण कविता हूँ
हमनें अपने ऊपर ही पालें हैं
आस्तीन के साँप कई
आज वो हम्को दँसने लगे हैं
हमको हमारी सीमाओं के
संकोच में कसने लगे हैं
सदियों से की गयी सहृदयता का
ये सुपरिणाम है
हमारे अनेक भू-भाग आज
हमारे दुष्मनों के नाम हैं
कभी कभी अपना पुनरावलोकन भी
करने लगता हूँ मैं
तब हमें लगता है कि
कितना ग़लत किया था
इन आस्तीन के साँपों को पालकर
अन्त में बैठ जात हूँ मै
अपने विचारों से हारकर
और सोचता हूँ
मेरी व्यथा तभी कथा बन सकेगी रामायणी
जब मेरे पुत्र इन आस्तीन के
साँपों के लिये
फिर ....................
"जनमेजय का नागयज्ञ"
करेंगे
और इअस बार
वे इन नागों को
छिपने का कोई अवसर नही देगें
एक-एक कर सबको..........................
सोने की चिड़िया था
कभी नन्दनवन था
कभी मैं
देवों के लिये मनभावन था
प्रसारित होता था
मुझसे......
एकता प्रेम, विश्वबन्धुतव का
संदेश
था मैं शान्ति का प्रतीक
अति पावन था यह भारत देश
पर आज
मेरी सीमाएँ
सुलग रही हैं
कही माओवदी आग लगा रहे हैं
कही अलगाववादी लोगों को
भगा रहे हैं
कही आतंकवादी
हमको उड़ाने की
योजना बना रहे हैं
कहीं बन विस्फोट हो रहे हैं
कही सरे आम गोलियाँ चल रही हैं
कही पर कर्फ्यू लगा है
कही प्रदर्शन हो रहा है
ये सब देख कर मैं रो पड़ता हूँ
सच में........
आज मैं केसी करुण कवि की
कारुण्यपूर्ण कविता से भी
करुण कविता हूँ
हमनें अपने ऊपर ही पालें हैं
आस्तीन के साँप कई
आज वो हम्को दँसने लगे हैं
हमको हमारी सीमाओं के
संकोच में कसने लगे हैं
सदियों से की गयी सहृदयता का
ये सुपरिणाम है
हमारे अनेक भू-भाग आज
हमारे दुष्मनों के नाम हैं
कभी कभी अपना पुनरावलोकन भी
करने लगता हूँ मैं
तब हमें लगता है कि
कितना ग़लत किया था
इन आस्तीन के साँपों को पालकर
अन्त में बैठ जात हूँ मै
अपने विचारों से हारकर
और सोचता हूँ
मेरी व्यथा तभी कथा बन सकेगी रामायणी
जब मेरे पुत्र इन आस्तीन के
साँपों के लिये
फिर ....................
"जनमेजय का नागयज्ञ"
करेंगे
और इअस बार
वे इन नागों को
छिपने का कोई अवसर नही देगें
एक-एक कर सबको..........................
Monday, September 1, 2008
शिक्षा और साक्षरता
शिक्षा किसी भी समाज की अपरिहार्य आवश्यकता है । जीवन को संस्कारित करने का आवश्यक साधन है । शिक्षा एक ऎसी प्रक्रिया है जो सतत् चलती रहती है । यह मात्र पुस्तकों तथा विद्यालयों तक सीमित नही है । पुस्तकों और विद्यालयों तक शिक्षा को सीमित कर हमनें इसके अर्थ में संकोच कर दिया है । शिक्षा साक्षरता भी नही है । एक निरक्षर व्यक्ति भी शिक्षित कहलाने का अधिकारी है यदि उसमें सभ्यता है संस्कार है । भारत एक विशाल जनसंख्या वाला देश है । गाँवों का देश है । साक्षरता दर यहाँ अपेक्षाकृत कम है । पर इसका अर्थ यह कदापि नही कि यहाँ शिक्ष्त व्यक्तियों की संख्या भी उतनी ही है जितनी साक्षरों की। साक्षर होना शिक्षित होने के लिये अनिवार्य नही है ।अक्षर (letter) तो मात्र शिक्षा का एक माध्यम ,एक साधन है । यह परिस्थितियों पर तथा व्यक्ति पर निर्भर करता है कि वह इस साधन का प्रयोग कर सके या करना चाहे । शिक्षा का अर्थ ज्ञान है । पुस्तकों में लिखी ज्ञान की बातें ही मात्र ज्ञान नहीं हैं अपितु ज्ञान पुस्तकों से बाहर भी है जो दैनिक-जीवन में समय-समय पर हमें मिलता रहता है। पुस्तकीय विद्या हमें मार्ग अवश्य दिखाती है पर हमें मार्ग पर चला नही सकती ह्। हमें अनुभव के गहरे सागर में गोते लगाना बता सकती है पर सीप का अभिज्ञान नही करा सकती । उस अनुसार हम अनपढ कह सकते हैं । पर वस्तुतः हमें उनको ऎसा मानने में संदेह होता है । कबीर जैसे ज्ञानमार्गी कवि आज की परिभाषा के अनुसार अनपढ कहे जाते हैं, जबकि उनके दोहे पढे-लिखे व्यक्तियों के भी छक्के छुडा सकते हैं । इसका एकमात्र कारण हमारी आयायित मानसिकता है । शताब्दियों की परतंत्रता ने हमारे मानस को परतंत्र बना दिया है और आज भी हम उससे मुक्त नही हो पाये हैं । इसी लिये हमने अपने लिये बनाये गये मापदण्ड भी पश्चिम से आयात कर लिये हैं पर क्या कभी मिट्टी के मटके में हाथी बैठ सकता है । नही ऎसा कदापि सम्भव नही है । वैसे ही स्थिति आज हमारी है हम आयातित मापदण्डों पर साक्षर और निरक्षर के मापन पर करते हैं । और ऎसा करते समय हम अपनी प्राचीनतम परम्परा श्रुति परम्परा को भूल जाते हैं जिसकी देन हामारे वेद, वेदाङ्ग, ब्राह्मण ,आरण्यक, उपनिषद् हैं । पाश्चात्य परम्परा का सूत्रपात बाइबिल से हुआ है । जो प्रारम्भ से ही लिखित है । अतः वहाँ प्रत्येक मापदण्ड लिखित को केन्द्र में रखकर बना है । हमारे यहाँ "लिखित" की कोई संकल्पना नही रही । भारतीय परम्परा श्रुति परम्परा है जिसमें मौखिक केन्द्र में है। लिखित का यहाँ कभी कोई महत्त्व नही रहा है । अतः हमारे मापदण्ड भी मौखिक ही हैं तथा लिखित के जामे को पहनाने से वे खरे नहीं उतर सकते ।शिक्षा की संकल्पना भी मौखिक है यहाँ। पर लिखित मापदण्ड को आरोपित कर हम "अनपढ" बने हुऎ हैं। जबकी यहाँ का जन-जन शिक्षित है । यदि निरपेक्ष दृष्टि से देखा जाये तो यहाँ आधुनिक मापदण्ड के अनुसार जितने शिक्षित हैं उनमें से अनेक भारतीय मापदण्ड के अनुसार अशिक्षित की श्रेणी में आयेंगे ।
Friday, August 29, 2008
प्रेम
भारतीय संस्कृति में प्रेम के अनेक रूप हैं-वात्सल्य,स्नेह,अनुराग,रति,भक्ति,श्रद्धा आदि। परन्तु वर्तमान समय में प्रेम मात्र एक ही अर्थ में रूढ हो गया है, वो है प्यार जिसको अंग्रेज़ी मे "LOVE" कहते हैं। प्रथमतः प्रेम शब्द कहने पर लोगो के मस्तिष्क में इसी "LOVE" का दृश्य कौंधता है। प्रत्येक शब्द की अपनी संस्कृति होती है । उसके जन्मस्थान की संस्कृति, जहाँ पर उस शब्द का प्रथमतः प्रयोग हुआ। अतः प्रेम और "LOVE" को परस्पर पर्यायवाची मानने की हमारी प्रवृत्ति ने प्रेम शब्द से उसकी पवित्रता छीन ली है। परिणामतः प्रेम शब्द कहने से हमारे मस्तिष्क में अब वह पावन भाव नही आता जो हमें मीरा,सूर, कबीर,तुलसी, जायसी, घनानन्द, बोधा, मतिराम, ताज, रसखान,देव और बिहारी प्रभृत हिन्दी कवियों तथा कालिदास जैसे संस्कृत कवियो की रचनाओं में देखने को मिलता है। आज हम विस्मृत कर चुके हैं कि इस"LOVE" के अतिरिक्त भी प्रेम का कोई स्वरूप होता है।
आज का "प्रेम कागज़ी फूलों के गुलदस्तों" में उलझकर अपनी वास्तविक सुगन्ध खो बैठा है। आज हम अपने शाश्वत, सनातन प्रेम के उस स्वरूप को विस्मृत करके गर्वानुभूति से फूले नही समाते जिसके कारण भारत अतीत काल में शताब्दियों तक विश्व के लिये दर्शनीय और स्पृहणीय बना रहा तथा मुगल सम्राटों तक ने जिसको महत्त्व दिया। जो संस्कृति जिस वस्तु के जितने रूपों का दर्शन करती है उसके पास उस वस्तु के लिये उतने शब्द होते हैं । हमारे ऋषियों ने , हमारे स्वनामधन्य पूर्वजों ने प्रेम के असंख्य रूपों को देखा था, उसी दर्शन का परिणाम है कि हमारी संस्कृति में प्रेम के लिये अनेक शब्द हैं। इस शब्दों के मर्म को ऎसा कोई व्यक्ति नही समझ सकता जिसने इसे अनुभव न किया हो। क्योंकि इसको शब्दो द्वारा पूर्णतः व्याख्यायित करना असम्भव नही तो दुष्कर अवश्य है। प्रेम कोई गुड्डे-गुडियों का खेल नही सच्चे अर्थों में यह एक साधना है । प्रेम जैसे शब्द की जो अपने अन्तस् में अनेक शब्दों को सँजोये हुए है "LOVE" जैसे उथले शब्द से तुलना करना निश्चय ही दुर्भाग्यपूर्ण है और कहीं न कहीं अपने बारे में हमारी अल्पज्ञता का परिचायक है । इसके विष्य में एक तरफ कहा गया है कि-"प्रेम कौ पन्थ कराल महा तलवार के धार पर ध्याइबो है" तथा दूसरी तरफ कहा गया है कि"अति सूधो प्रेम कौ मारग है जहाँ नैकु सयानप बाँक नहीं"। हमारे कवियो ने उषाकाल से ही प्रेम के स्वरूप पर चर्चा करनी प्रारम्भ कर दी थी चाहे वह पुराणी युवती उषा के विषय में हो अथवा पुरुरवा-उर्वशी के आख्यान के रूप में हो । कालिदास ने तो प्रेम का अद्भुत रूप चित्रित ही किया है। यदि हम सम्पूर्ण भारतीय साहित्य पर विहंगम दृष्टि डाले तो शायद ही किसी भाषा का कोई कवि बचा हो जिसने इस विषय पर अपनी कलम न चलायी हो। पर आज जिस संकुचित अर्थ में प्रेम को लिया जा रहा है उस अर्थ में उसे कभी नहीं लिया गया।
आज का "प्रेम कागज़ी फूलों के गुलदस्तों" में उलझकर अपनी वास्तविक सुगन्ध खो बैठा है। आज हम अपने शाश्वत, सनातन प्रेम के उस स्वरूप को विस्मृत करके गर्वानुभूति से फूले नही समाते जिसके कारण भारत अतीत काल में शताब्दियों तक विश्व के लिये दर्शनीय और स्पृहणीय बना रहा तथा मुगल सम्राटों तक ने जिसको महत्त्व दिया। जो संस्कृति जिस वस्तु के जितने रूपों का दर्शन करती है उसके पास उस वस्तु के लिये उतने शब्द होते हैं । हमारे ऋषियों ने , हमारे स्वनामधन्य पूर्वजों ने प्रेम के असंख्य रूपों को देखा था, उसी दर्शन का परिणाम है कि हमारी संस्कृति में प्रेम के लिये अनेक शब्द हैं। इस शब्दों के मर्म को ऎसा कोई व्यक्ति नही समझ सकता जिसने इसे अनुभव न किया हो। क्योंकि इसको शब्दो द्वारा पूर्णतः व्याख्यायित करना असम्भव नही तो दुष्कर अवश्य है। प्रेम कोई गुड्डे-गुडियों का खेल नही सच्चे अर्थों में यह एक साधना है । प्रेम जैसे शब्द की जो अपने अन्तस् में अनेक शब्दों को सँजोये हुए है "LOVE" जैसे उथले शब्द से तुलना करना निश्चय ही दुर्भाग्यपूर्ण है और कहीं न कहीं अपने बारे में हमारी अल्पज्ञता का परिचायक है । इसके विष्य में एक तरफ कहा गया है कि-"प्रेम कौ पन्थ कराल महा तलवार के धार पर ध्याइबो है" तथा दूसरी तरफ कहा गया है कि"अति सूधो प्रेम कौ मारग है जहाँ नैकु सयानप बाँक नहीं"। हमारे कवियो ने उषाकाल से ही प्रेम के स्वरूप पर चर्चा करनी प्रारम्भ कर दी थी चाहे वह पुराणी युवती उषा के विषय में हो अथवा पुरुरवा-उर्वशी के आख्यान के रूप में हो । कालिदास ने तो प्रेम का अद्भुत रूप चित्रित ही किया है। यदि हम सम्पूर्ण भारतीय साहित्य पर विहंगम दृष्टि डाले तो शायद ही किसी भाषा का कोई कवि बचा हो जिसने इस विषय पर अपनी कलम न चलायी हो। पर आज जिस संकुचित अर्थ में प्रेम को लिया जा रहा है उस अर्थ में उसे कभी नहीं लिया गया।
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